Wednesday, December 17, 2014

भोजपुरी सिनेमा के विकास के लिए वित्तीय संस्थानों का होना आवश्यक - सुजीत तिवारी


सुजीत तिवारी (सी.पी. आई. मूवीज़) भोजपुरी सिने जगत् के ऐसे कर्णधारों में से एक हैं, जिन्होंने ईमानदारी से भोजपुरी फिल्मों को एक नयी ऊँचाई प्रदान कराने की दिशा में सकारात्मक प्रयास किया है। सुजीत तिवारी सीधी तौर पर हिन्दी फिल्मों को भी अपना योगदान दे सकते थे, लेकिन, उनको अपनी मिट्टी से इस कदर लगाव है कि बिन भोजपुरी के उन्हें नींद नहीं आती। इस भाषा, बोली की मिठास का सचमुच सानी नहीं। सुजीत इसे ही राष्ट्रीय स्तर पर प्रक्षेपित करने की चिंता करते रहते हैं। वह भोजपुरी सिनेमा को लेकर क्या-क्या सोच रहे हैं।  सुजीत तिवारी से विभिन्न मुद्दो पर विस्तृत बातचीत हुई।   प्रस्तुत है, उस भेंटवार्ता के सम्पादित अंश।
आपको मुख्यधारा में आना चाहिए? हिन्दी में बन रही अच्छी-अच्छी फिल्मों को वित्तीय पोषण देना चाहिए। स्वयं भी आपको हिन्दी फिल्मों का निर्माण करना चाहिए।
पूर्वी उत्तर  प्रदेश और बिहार के लोगों के लिए हिन्दी-भोजपुरी माँ-मौसी जैसी है। चौखट  के अंदर भोजपुरी तो बाहर हिन्दी का बोलबाला रहता है। लेकिन, जिसके दादा (रामायण तिवारी) भोजपुरी सिनेमा के प्रासाद-निर्माण में नींव की ईंट बने, उनका पोता इतनी आसानी से कैसे छोड़ दे भोजपुरी फिल्मों का दामन ! दादाजी को भोजपुरी फिल्में करना कोई लाचारी नहीं थी। वह तो हिन्दी में भी बुरी तरह व्यस्त रहे। पर, अपनी माटी की गरिमा को बनाये रखना उनको , नजीर हुसैन, सुजीत कुमार को प्रिय था। मेरे पिताजी (भूषण तिवारी) ने भी इसका निर्वाह किया। फिर में कैसे पीछे रहूँ?
भोजपुरी सिनेमा को बेहतर स्थिति में लाने के लिए क्या करने चाहिए।
भोजपुरी सिनेमा बेलगाम घोड़े की तरह दौड़ रहा है। कोई ‘सिस्टम’ नहीं, कोई अपनी शैली नहीं, कोई अपना तौर-तरीका नहीं। सबसे बड़ी बात की भोजपुरी फिल्म बनाने के लिए पैसे कहाँ-कहाँ से आ सकते हैं। बिन पैसे के कोई योग्य लेखक-निर्देशक कैसे कोई फिल्म बना सकता है, इसका कोई रास्ता नहीं बना है।
फिर क्या करना चाहिए?
हाॅलीवुड-बाॅलीवुड की तरह भोजपुरी फिल्मों के लिए भी फिनांस इंस्टीट्यूशंस (वित्तीय संस्थान) होने चाहिए। इसके अभाव में कोई भी निर्माता-निर्देशक प्रस्तुतकर्ता-वित्तीय पोषक के अधीन हो जाता है। न चाहते हुए भी व्यावसायिकता के नाम पर अनावश्यक समझौते करने पड़ जाते हैं। यह प्रक्रिया बेहतर फिल्में बनाने की राह में रोड़े की तरह पड़ जाती है। बिन पैसे के, फंड के फिल्में बनती हैं क्या? अगर नहीं, तो इसके लिए एक ‘डेस्टिनेशन’ तो होना ही चाहिए।
इसके लिए अपने स्तर से आपने कुछ किया है?
बहुत किया है। अपनी कम्पनी सी.पी.आई. मूवीज के द्वारा महज दो वर्षों में लगभग डेढ़ दर्जन फिल्मों को वित्तीय आधार दिया, उन्हें इस संकट से उबारा है। अब भी कर रहा हूँ।
इस उद्योग की ऐसी दशा के लिए कौन-कौन सी बातें बाधक बन रही हैं?
एक तो ईमानदारी की कमी है, समर्पण भाव की कमी है। बिना इसके आप कुछ पैसे तो कमा लेंगे। अच्छी फिल्में कभी न बन सकेंगी। अच्छी फिल्में कभी न बन सकेंगी। भेड़ चाल और भेड़-बकरी-सा जमावड़ा करने से फिल्में नहीं बनती। फिल्म बनती है पैसे से और पैसे किसी वित्तीय संस्थान के होने चाहिए, सूदखोर सेठ, साहूकार के नहीं। लेकिन भोजपुरी फिल्मोद्योग में एक और समस्या है। पैसे मिल जाने के बाद उसका दुरूपयोग भी खूब होता हे। मैं इन बातों को झेल चुका हूँ।
सी.पी.आई. मूवीज की कितनी फिल्में आ रही हैं
भोजपुरी में दो तैयार हैं- ‘‘दूध का कर्ज’’ और ‘‘जानी दुश्मन’’, मराठी में ‘‘मध्यमवर्ग’’ रिलीज़ हुई है अभी अभी  तथा हिन्दी में ‘‘रणभूमि’’। हमारी होम प्रोडक्शन की तीन  और भोजपुरी फिल्में बन रही हैं।
वित्तीय बातों के अतिरिक्त और कौन-कौन सी बातें भोजपुरी फिल्मों को पीछे धकेल रही है?
भोजपुरी सिनेमा में प्रोफेशनल लोगों का घोर  अभाव है। आप सोचिए, 40 प्रतिशत उत्तरभारतीय  हैं और भोजपुरी फिल्म उद्योग का सालाना  व्यवसाय बस पचास करोड़ में सिमट जाता है।   हम दक्षिण की फिल्मों की देखा-देखी तो करते हैं, मगर उनके उत्थान की मूल बातें नहीं देखते। जब तक हम 200-300 करोड़ तक के नहीं होंगे, तब तक बस ऐसी ही फिल्में बनती रहेगी।
पर इस उपलब्धि को आप हासिल कैसे करेंगे?
बताया तो, बिन फायनेंस के कोई उद्यम नहीं चल सकता। उसके लिए फिनांस इंस्टीट्यूशन चाहिए ही चाहिए। इसके लिए जो की-मेकर्स हैं, उन्हें सोचना पड़ेगा।
udaybhagat@gmail.com