Tuesday, November 15, 2011

मंजिल अब दूर नहीं - बालगोविन्द



जिस तरह सोना आग में ताप कर कुंदन बन जाता है उसी तरह संघर्ष की आग में तप कर बिहार के कटिहार के बालगोविन्द में एक मंझा हुआ कलाकार बन कर उभरा है. अभिनय की भूख लेकर बरसो पहले मुंबई आये बाल गोविन्द की बदकिस्मती रही की उनके फिल्मो की चाह में कभी उन्हें किसी के यहाँ खाना बनाकर अपना पेट पालने पर तो कभी सडको पर सब्जी बेचने को मजबूर होना पड़ा . हालांकि बाल गोविन्द को इसका कोई मलाल नहीं है. पिछले दिनों पनवेल के सुर्वे फार्म हाउस में निर्माता जितेश दुबे और निर्देशक अजय कुमार की फिल्म यादव पान भण्डार के आखिरी दिनों की शूटिंग में बालगोविन्द के जबरदस्त अभिनय से वहाँ मौजूद सभी लोगो ने तारिफ की . जीतेश दुबे के मुरीद बाल गोविन्द कहते हैं की उनकी ही फिल्म बृजवा से पहली बार उन्हें कलाकारों सा सम्मान मिलना शुरू हुआ . निर्देशक दीपक तिवारी की फिल्म धुरंधर में भी बालगोविन्द ने सबो को तारिफ के लिए मजबूर कर दिया . खुद बालगोविन्द कहते हैं एक कलाकार के लिए सबसे बड़ा सम्मान उनके सह कलाकारों और दर्शको की तारिफ होती है , मुझे ख़ुशी है की अब वो सब मिलना शुरू हो गया है जिसकी चाह में वो माया नगरी मुंबई आये थे . बहरहाल भोजपुरी के सारे धुरंधरो से परदे पर दो दो हाथ कर चुके बालगोविन्द के लिए अब मंजिल दूर नहीं है